राजेश और दुर्गा ने नाश्ता करके बिस्तर पर लेट गए। दोपहर का समय था, और थकान से दोनों की आंखें भारी हो रही थीं। राजेश ने दुर्गा को गले लगाते हुए कहा, 'शाम को मेरी बुआ घर आएगी, और आस-पास की औरतें तेरे चेहरे को देखने के लिए इकट्ठी हो जाएंगी। ये शादी हो चुकी है, तू मेरी बीवी है, इसलिए खुश रहना।' दुर्गा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, और राजेश की छाती पर सिर रखकर सो गई। राजेश भी उसकी सांसों की गर्मी महसूस करते हुए नींद में खो गया।
शाम ढलने लगी, जब उनकी आंखें खुलीं। कमरे में हल्की रोशनी थी, और बाहर से चहचहाहट की आवाजें आने लगीं। राजेश ने दुर्गा को अपनी ओर खींचा, उसके होंठों पर चुंबन किया। 'उठो मेरी जान, शाम हो गई। लेकिन पहले...' उसने शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा। दुर्गा की साड़ी अभी भी खुली हुई थी, और राजेश का लंड पहले से ही उत्तेजित होकर खड़ा हो गया था। वह बिस्तर पर लेटा रहा, और दुर्गा को नीचे झुकने का इशारा किया।
















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