अगले दिन पानिबाई और अनुराग के पिता राजवर्धन सिंह राजेश के घर पहुँचे। राजेश ने उनका स्वागत किया और उन्हें बैठक में बिठाया। दुर्गा ने दोनों को प्रणाम किया, उसके चेहरे पर थोड़ी शर्म और थकान झलक रही थी। वह जल्दी से रसोई की ओर चली गई, लेकिन उसकी चाल देखकर पानिबाई की आँखें सिकुड़ गईं। दुर्गा की कमर झुककर चल रही थी, हर कदम के साथ हल्का सा दर्द सा लग रहा था—साफ जाहिर था कि राजेश ने उसे रात भर पेला था, उसकी चूत को चोदा था जब तक वह सुन्न न हो गई। पानिबाई ने मन ही मन मुस्कुरा लिया, सोचते हुए कि ये शादी सही साबित हो रही है।
राजवर्धन सिंह ने राजेश को गर्मजोशी से गले लगाया और बोले, 'राजेश भाई, तुझे दिल से धन्यवाद। दुर्गा से शादी करके तूने उसे हवेली और अनुराग से दूर कर दिया। अब वो हमारे बेटे की जिंदगी में घुसपैठ नहीं करेगी।' राजेश ने सिर हिलाया, उसकी आँखों में संतुष्टि थी। 'हुकुम ये तो मेरा फर्ज था। दुर्गा अब मेरी बीवी है, और मैं उसे कंट्रोल में रखता हूँ। वो अब सिर्फ मेरी है।'
















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