राजेश का गुस्सा आसमान छू रहा था। आज काम पर झगड़े में मारपीट हो गई थी, और रात के दो बजे घर पहुँचते-पहुँचते उसका चेहरा लाल हो चुका था। दरवाजे पर पहुँचकर उसने जोर-जोर से खटखटाया, तीन-चार बार। अंदर से हलचल हुई, और आखिरकार दुर्गा ने आँखें मलते हुए दरवाजा खोला। वह नींद में उभरी हुई लग रही थी, साड़ी ठीक से न लगी हुई।
'तेरा पति अभी तक घर नहीं आया था और तू सो रही है? हरामी औरत!' राजेश चिल्लाया, उसकी आँखों में आग बरस रही थी। दुर्गा चौंक गई, लेकिन बोलने का मौका मिला ही नहीं। राजेश ने उसे जबरदस्ती पकड़ लिया, साड़ी का आँचल खींचा और ब्लाउज फाड़ दिया। दुर्गा चीखी, 'राजेश जी, क्या कर रहे हो? रुक जाओ!' लेकिन राजेश का गुस्सा काबू में न था। उसने दुर्गा की साड़ी पूरी तरह उतार फेंकी, पेटीकोट भी खींचकर नीचे कर दिया। अब दुर्गा बिल्कुल नंगी खड़ी थी, उसके बड़े-बड़े स्तन हिल रहे थे, चूत पर हल्के बाल चमक रहे थे रात की रोशनी में।
















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